अहम की लडाई में परिवार के साथ पिसता समाज, अब रावण दहन के साथ अपने अहम का भी दहन जरूरी: सामाजिक एकता के लिए उठाने होंगे जरूरी क़दम
युवा मेलघाट न्यूज़| एक सामाजिक चिंतन
धारणी १८ अक्टोंबर | दशहरा आने वाला है। हर चौक-चौराहे पर रावण के पुतले खड़े होंगे। हम हर साल रावण को जलाएंगे, तालियां बजाएंगे और घर चले जाएंगे। पर क्या कभी हमने सोचा है कि असली रावण बाहर नहीं, हमारे अंदर है?
आज हमारा समाज भी ठीक उसी मोड़ पर खड़ा है, जहाँ त्रेतायुग में अयोध्या और द्वापर में हस्तिनापुर खड़ा था। इतिहास खुद को दोहरा रहा है। इतिहास में महाभारत ने हमें सिखाया कि जब कौरव और पांडव दो परिवार आपस में लड़े, तो विनाश किसी एक का नहीं हुआ, संपूर्ण कुल का हुआ, संपूर्ण परिवार का हुआ। आज कलयुग में वही छुपा महाभारत हो रहा है।हमारा समाज आपस में लड़ रहा है। परिवारों को इसके बीच में घसिटा जा रहा है। कुछ लोगों के स्वार्थ और जिद्दी अहम की लड़ाई में पूरा समाज पिस रहा है।
पुराणों से हमने क्या सीखा?
हम हर साल कथाएं सुनते हैं। भागवत कथा में सुनते हैं – एकता में ही शक्ति है। रामायण हमें त्याग सिखाती है कि भरत जैसा भाई राजगद्दी ठुकरा देता है। महाभारत चेतावनी देता है कि अहम से वंश का नाश होता है। हम सब सुनते हैं, सिर हिलाते हैं, आँखों में आँसू भी लाते हैं, पर कथा मंडप से बाहर निकलते ही सब भूल जाते हैं।
अगर पुराणों से सीख लेकर भी हम नहीं सुधरे, तो समाज का बिखराव और पतन निश्चित है। यह सबसे बड़ी चिंता की बात है।
समाज की दशा – हम प्रगत हैं, पर एक नहीं
यह किसी से छुपा नहीं कि आज हमारा समाज प्रगति कर रहा है। राजकीय क्षेत्र में हमारी पूछ है, आर्थिक रूप से हम संपन्न हैं, शैक्षणिक क्षेत्र में हमारे बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, वकील बन रहे हैं। हमारे पास खुद के बड़े-बड़े भवन हैं, संस्थाएं हैं, संगठन हैं।
लेकिन एक सवाल अपने दिल पर हाथ रखकर पूछिए – क्या हमारे पास एकता है?
आज एक ही सभागृह में दो खेमे अलग-अलग बैठते हैं। एक ही समाज के दो कार्यक्रम एक ही दिन होते हैं। एक व्यक्ति अच्छा काम भी करे, तो दूसरा गुट सिर्फ इसलिए उसका विरोध करता है क्योंकि वह हमारे गुट का नहीं है। यह देखकर हमारे बुजुर्गों की आत्मा रोती होगी, जिन्होंने इस समाज को जोड़ने के लिए अपना जीवन खपा दिया था।
रावण दहन से सीख – इस दशहरे पर क्या जलाएंगे?
दशहरे का असली अर्थ ही बुराई पर अच्छाई की जीत है। रावण के दस सिर प्रतीक हैं – अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह, स्वार्थ, ईर्ष्या, द्वेष, जिद, घमंड और दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति।
हम हर साल लकड़ी और कागज के रावण को जलाते हैं। इस बार इस दशहरे पर क्यों न हम संकल्प लें कि हम अपने अंदर के रावण को भी जलाएंगे?
अपने अहम के रावण का दहन करना होगा। अपने स्वार्थ के रावण का दहन करना होगा। “मैं ही बड़ा हूँ” – इस जिद्दी सोच के रावण का दहन करना होगा। जब तक हम अपने अंदर के इस रावण को नहीं मारेंगे, तब तक बाहर का कोई भी रावण दहन हमें फल नहीं देगा।
अब चुप नहीं बैठ सकते – समाज को जागना होगा
जो लोग अपने निजी अहम की लड़ाई में सामाजिक एकता को क्षति पहुंचा रहे हैं, उनसे अब समाज को सतर्क रहना होगा। चुप रहना अब पाप के बराबर है।
क्या समाज यूं ही गलत को चुपचाप देखता रहेगा? क्या हम तमाशा देखते रहेंगे और अपने बच्चों के लिए बिखरा हुआ समाज छोड़ जाएंगे?
समाज को अब तय करना होगा –
- हमें विरोध विचारों का करना है, किसी व्यक्ति विशेष का नहीं। मतभेद हो सकते हैं, मनभेद नहीं होने चाहिए।
- हमें गलत को गलत और सही को सही कहना सीखना होगा, चाहे वह हमारा कितना भी अपना क्यों न हो। सच्चा हितैषी वही है जो आइना दिखाए।
- जो एकता में बाधा डाल रहे हैं, उन्हें बड़े-बुजुर्गों ने, पंच-परमेश्वर ने प्रेम से समझाना होगा, चेतावनी देनी होगी और जरूरत पड़े तो सुधारना भी होगा। वरना यह छोटी सी सामाजिक खाई कल इतनी बड़ी खाई बन जाएगी कि उसे भरना असंभव हो जाएगा।
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दिशा क्या हो? – युवाओं से एक भावुक अपील
हमारे पूर्वजों ने एक सपना देखा था – एक ऐसा समाज जो एक हो, सुसंस्कृत हो, जिसका इतिहास स्वर्णिम हो। आज उस सपने को पूरा करने का मौका हमारे हाथ में है। आज हमारे पास इतिहास बनाने का, इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का मौका है।
इसके लिए हमें स्वार्थ का त्याग कर बड़े मन से अपने अहम का बलिदान देना होगा। समाज के सभी तबकों को – गरीब हो या अमीर, शिक्षित हो या अशिक्षित, युवा हो या बुजुर्ग – सबको साथ लेकर चलना होगा।
विशेषकर युवाओं से एक हाथ जोड़कर विनती है। बेटा, तुम ही इस समाज का भविष्य हो। तुम्हारे हाथ में मोबाइल है, जिसमें पूरी दुनिया है, पर क्या तुम्हारे दिल में अपने समाज के लिए जगह है? अपने संस्कार और संस्कृति को मत भूलो। अपने से बड़ों का, अपने बुजुर्गों का सम्मान करना सीखो। जिस दिन युवा अपने बड़ों के पैर छूने के बजाय उन पर उंगली उठाने लगें, समझो समाज की नींव हिल गई।
अंत में एक सवाल समाज से
यह लेख किसी एक व्यक्ति या परिवार के खिलाफ नहीं, यह एक आइना है। यह एक दर्द है, जो समाज के हर उस व्यक्ति के दिल में है जो समाज से सच्चा प्रेम करता है।
तो क्या इस दशहरे पर हम सिर्फ रावण का पुतला जलाएंगे, या अपने अंदर के अहम, स्वार्थ और फूट के रावण को भी जलाएंगे?
फैसला हम सबको करना है। क्योंकि अगर आज भी हम नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।
इस पर विचार जरूर करें, विचार अच्छे लगे तो ख़ुद भी जागें ओर समाज हित में जागृती फैलाये..!
जय सहस्त्रबाहु! जय कलाल! जय समाज एकता!
🌹🙏
💫पत्रकार दीपक मालवीया ‘दीपश्री’
संपादक
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