मेळघाट में सौर ऊर्जा के नाम पर जमीनों का सौदा: गैर-आदिवासी किसानों को 29 साल के लीज जाल में फंसाने की तैयारी: ग्रामसभा को अंधेरे में रखा
सरकारी योजना में ₹1.25 लाख प्रति हेक्टेयर किराया, प्राइवेट कंपनियां दे रहीं झांसे भरे ऑफर; एग्रीमेंट साइन करते ही 30 साल के लिए बैंक लोन, बिक्री पर ताला
युवा मेलघाट न्यूज़ __________________________________ धारणी (मेळघाट) – मेळघाट के अनुसूचित क्षेत्र में सोलर कंपनियों ने आदिवासी कानून से बचने का नया रास्ता निकाल लिया है। आदिवासी जमीन पर PESA के कारण कब्जा न कर पाने से अब कंपनियों ने धारणी, चिखलदरा, हरिसाल बेल्ट के गैर-आदिवासी किसानों की जमीनों को टारगेट करना शुरू कर दिया है। किसानों को 29 साल 11 महीने के लिए जमीन भाड़े पर देने के लिए ₹50 से 60 हजार प्रति एकड़ सालाना का लालच दिया जा रहा है।
पर्दे के पीछे का खेल क्या है?
महाराष्ट्र सरकार की अधिकृत योजना मुख्यमंत्री सौर कृषि वाहिनी योजना 2.0 है। इसमें सरकार खुद किसानों से 30 साल के लिए जमीन लेकर सालाना ₹1.25 लाख प्रति हेक्टेयर किराया देती है, हर साल 3% बढ़ोतरी के साथ, और जमीन का मालकी हक्क हमेशा किसान का ही रहता है। यह सरकारी दर है।
लेकिन प्राइवेट कंपनियां इसी सरकारी योजना का नाम लेकर किसानों से प्राइवेट एग्रीमेंट करा रही हैं। PM-KUSUM में भी सरकार ने माना है कि लीज पर लगभग ₹25,000 प्रति एकड़ प्रति वर्ष आय हो सकती है। प्राइवेट कंपनियों का ऑफर इससे ज्यादा दिखाकर किसानों को फंसाया जा रहा है।
गैर-आदिवासी किसान सबसे ज्यादा खतरे में क्यों?
- कानूनी सुरक्षा नहीं: आदिवासी जमीन पर ग्रामसभा की अनुमति अनिवार्य है, क्योंकि राज्यपाल की अधिसूचना कहती है कि अनुसूचित क्षेत्र में कोई भी जमीन ग्रामसभा की पूर्व सहमति के बिना हस्तांतरित नहीं की जा सकती। गैर-आदिवासी जमीन पर कंपनियां इस नियम को बायपास करने की कोशिश कर रही हैं।
- बैंक के दरवाजे बंद: एक बार रजिस्टर्ड लीज हो गई तो अगले 29 साल तक उस 7/12 पर कोई भी बैंक फसल कर्ज, ट्रैक्टर या मकान लोन नहीं देगा।
- जमीन बंजर होने का खतरा: एग्रीमेंट में कहीं नहीं लिखा कि 29 साल बाद कंपनी सीमेंट के 300 पिलर और लोहे का स्ट्रक्चर हटाकर जमीन को खेती लायक बनाकर देगी। इसे साफ करने में किसान को लाखों रुपये खर्च करने पड़ेंगे।
कंपनियों की एग्रीमेंट में छिपे 2 खतरनाक क्लॉज:
सूत्रों से मिले जानकारी के अनुसार एग्रीमेंट में लिखा है – “अगर MSEDCL बिजली नहीं खरीदती या प्राकृतिक आपदा आती है तो कंपनी किराया रोक सकती है।” और “10 साल बाद किराया मार्केट रेट से रिवाइज किया जाएगा।” मतलब आज ₹60,000 बोलकर कल ₹30,000 कर सकते हैं।
युवा मेळघाट न्यूज की मांग:
प्रशासन ने इस पूरे मामले की जांच करनी चाहिए। हर सोलर लीज एग्रीमेंट से पहले ग्रामसभा का विशेष ठराव, तहसीलदार की अनुमति और किसानों को मुफ्त कानूनी सलाह अनिवार्य की जाए। किसान की जमीन ही उसकी पेंशन है, उसे 29 साल के कागजी जाल में नहीं फंसने दिया जा सकता। किसानों की जागरूकता ही गरीब किसानों के बच्चों का भविष्य है। किसानों को कंपनियों के मायाजाल से बचाना ही प्रशासन शासन एवं जागरूक नागरिकों का कर्तव्य है, ताकी किसानों के साथ कुछ भी ग़लत ना हो।








