धर्म-संस्कृति बचाने युवा मेलघाट से उठी धर्माचार्य की आवाज़ – सुन्दरकाण्ड पाठ दिखावा नहीं साधना है!
DJ, नाच-गाना और गुटखे के बीच खो रही धर्म – संस्कृती की मर्यादा, धार्मिक अनुष्ठानों के बिगड़ते स्वरुप पर चिंता
युवा मेलघाट | धर्म-संस्कृति स्तंभ
॥ जय सियाराम ॥ ॥ जय श्री हनुमान ॥
प्रिय सभी धर्मप्रेमी बंधू, बहनों, युवाओं आज हम एक गंभीर विषय पर चिंतन करना है . हमारी सनातन परंपरा में ‘सुंदरकांड’ केवल पाठ नहीं, एक जीवंत साधना है. यह श्रीरामभक्त हनुमान जी के शौर्य, सेवा, भक्ति और धैर्य का साक्षात दर्शन है. पर खेद है कि धीरे-धीरे हम इस दिव्य अनुष्ठान को ‘कार्यक्रम’ बना रहे हैं.
1. स्मरण रहे – हम क्या खो रहे हैं?
जब सुंदरकांड के बीच DJ बजता है, भजनों पर पांव थिरकते हैं, चाय-नाश्ते के लिए पाठ रोका जाता है, मोबाइल की घंटी बजती है, तब हम हनुमान जी के उस ‘मौन, एकाग्र, अखंड’ स्वरूप का अपमान करते हैं, जिसने लंका में एक पल भी विश्राम नहीं किया. सुंदरकांड मनोरंजन नहीं, आत्मशुद्धि का यज्ञ है. जहाँ शोर होता है, वहाँ श्रीराम का नाम ठहरता नहीं.
2. शास्त्र क्या कहता है?
हमारे ऋषियों ने कहा है – ‘एकाग्रचित्ते निराकुले, यः पठेत् सुन्दरकाण्डकम्’. अर्थात्, जो एकाग्र और स्थिर चित्त से सुंदरकांड पढ़ता है, उसके सारे संकट हनुमान जी हर लेते हैं.
क्या बीच में उठकर नाचने से, गुटखा खाकर थूकने से, हंसी-ठिठोली से वह एकाग्रता संभव है? नहीं. यह तो साधना की मर्यादा भंग करना है.
3. आने वाली पीढ़ी को क्या देंगे?
आज का बालक जब देखेगा कि सुंदरकांड = DJ + पार्टी + सेल्फी, तो वह कल इसे ‘पूजा’ कैसे मानेगा? याद रखें, परंपरा किताबों से नहीं, आचरण से आगे बढ़ती है.
हम सुधरेंगे तो संस्कृति बचेगी. हम बिगड़ेंगे तो धर्म केवल दीवार पर टंगा कैलेंडर बन जाएगा.
“संस्कृति का उपहास न बनाएं”
“सुंदरकांड में श्री हनुमान जी का पवित्र चरित्र, अपार शक्ति, प्रेरणा, समाधान और शांति छिपी है. आइए, हम सब मिलकर इसके मूल स्वरूप, मर्यादा और पवित्रता को बनाए रखें और आने वाली पीढ़ियों को सही मार्ग दिखाएं. “मेलघाट आदिवासी बहुल क्षेत्र है जहां रामायण और हनुमान जी के प्रति गहरी आस्था है. यहां गांव-गांव में सुंदरकांड पाठ का आयोजन होता है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में शहरीकरण के प्रभाव में यहां भी पाठ के दौरान दिखावे और आधुनिकता की होड़ बढ़ी है. बुजुर्गों का कहना है कि “पहले घर में दिया जलाकर, मौन होकर पाठ सुना जाता था. अब तो डीजे लगाकर वीडियो बनाना जरूरी हो गया है. “सभी मंडलों, आयोजकों और धर्मगुरुओं से अपील की है कि वे सुंदरकांड की गरिमा बनाए रखने के लिए आगे आएं. “अगर अभी नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ी सुंदरकांड को सिर्फ एक ‘इवेंट’ समझेगी, साधना नहीं,”
मार्ग क्या है? पंच-नियम उपदेश: 1. संकल्प लो: सुंदरकांड शुरू करने से पहले मन में संकल्प लो – “अगले 2 घंटे केवल रामजी और हनुमान जी के लिए”. 2. आसन न छोड़ो: पाठ शुरू हो तो पूर्णाहुति तक एक ही आसन पर स्थिर बैठो. शरीर स्थिर होगा तभी मन स्थिर होगा. 3. मौन ही भजन है: पाठ के बीच वार्तालाप, मोबाइल, चाय-नाश्ता वर्जित मानो. जो प्रसाद है, वह पूर्णाहुति के बाद ही ग्रहण करो. 4. सात्विकता रखो: स्थान पर सुगंध, दीप, पुष्प हो. मन में भाव हो, वस्त्र में शुद्धता हो, वाणी में मर्यादा हो.5. साधना समझो, समारोह नहीं: आयोजक बनो तो लाउडस्पीकर की नहीं, शांति की व्यवस्था करो. भीड़ नहीं, भक्ति इकट्ठी करो.
अंतिम निवेदन …
हे मेलघाट के युवाओं, हे धर्मरक्षकों, सुंदरकांड हमें संकट से उबारने आया है, हमें संकट में डालने नहीं.
आओ, हम प्रण लें कि अपने हर सुंदरकांड को ‘हनुमान जी का दरबार’ बनाएंगे – जहाँ केवल राम नाम की गूंज हो, अश्रुपूरित नेत्र हों, और नतमस्तक श्रद्धा हो.
क्योंकि जब साधना शुद्ध होती है, तभी सिद्धि आती है.
और जब परंपरा जीवित रहती है, तभी धर्म जीवित रहता है.
धर्मो रक्षति रक्षितः
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है.
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