मेलघाट में बैंक प्रतिनिधि चयन का “पांचवां साल वाला खेल”: 4 साल आम आदमी, 5वें साल रसूखदार – सोसायटी सभासदों का फायदा फिर जीरो; धारणी-चिखलदरा की विविध सहकारी सोसायटी और खरेदी-विक्री संघ में भी वही कहानी, आदिवासी सभासद पूछ रहे सवाल?
युवा मेलघाट न्यूज़ ब्यूरो टिम
धारणी / चिखलदरा। मेलघाट में किसानों की हालत बारिश के ना होने से भले ही खराब है, पर सोसायटी, संस्था संचालको की बल्ले बल्ले हो रही है। इस समय मेलघाट की सभी विविध सहकारी सोसायटियों में जिला मध्यवर्ती बैंक के प्रतिनिधि का चयन जोर-शोर से चल रहा है। सोसायटी,संस्थाओं के कागज पर प्रक्रिया भले ही लोकतांत्रिक दिखती है, लेकिन सहकारी सोसायटीयो, संस्थाओं की जमीन की हकीकत अलग ही है। पिछले चार साल तक (क्युकी उस समय जिला मध्यवर्ती बैंक का चुनाव नहीं होता) सोसायटियों में सामान्य, ईमानदार और किसान सभासद को ही सोसायटी बैंक प्रतिनिधि बनाया जाता है। वो भी सिर्फ “नाम के लिए”। उस तक बैंक की मीटिंग की जानकारी तक नहीं पहुंचती। लेकिन जैसे ही पांचवां साल आता है और जिला मध्यवर्ती बैंक का चुनाव नजदीक आता हैं, पूरा समीकरण बदल जाता है। सहकारिता के नाम पर नये नये गठजोड़ बनकर अपने-अपने स्वार्थ साधने सामने आते है।
पांचवें साल शुरू होता है “पैसे का खेला”
जिला मध्यवर्ती बैंक के चुनावी साल में प्रतिनिधि पद की कीमत बढ़ जाती है। बड़े-बड़े रसूखदार, ठेकेदार और राजनीतिक पकड़ वाले लोग सोसायटी के पदाधिकारियों के पास पहुंच जाते हैं। वादे, मान-सम्मान और कई बार आर्थिक लेन-देन भी होता है। नतीजा – 4 साल तक जो आम सभासद था, उसे हटाकर “रसूखदार व्यक्ति” का चयन कर दिया जाता है। ये दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि प्रतिनिधि का काम संस्था और आदिवासी सभासदों की भलाई के लिए है, न कि चुनाव लड़ने के लिए।
मेलघाट की स्थिति क्या है?
मेलघाट के धारणी व चिखलदरा तालुका में कार्यरत विविध कार्यकारी सहकारी सोसायटीयां, तालुका खरेदी विक्री सहकारी संस्थाओं और मेलघाट के शहर व दूरस्थ गांवों की दर्जनों सोसायटी, संस्थाओं में भी यही फंडा चल रहा है। मेलघाट के आदिवासी सभासद की सबसे बड़ी समस्या कर्ज, खाद-बीज और उचित दामों पर अपनी फसल बेचने और की है। उन्हें उम्मीद होती है कि उनका बैंक प्रतिनिधि बैंक में जाकर कम ब्याज पर कर्ज, समय पर ऋण माफी और आदिवासी क्षेत्र के लिए विशेष योजनाएं लाएगा। लेकिन चुनावी साल में बना रसूखदार प्रतिनिधि 5 साल तक बैंक की कुर्सी, मानदेय और कमीशन तक ही सीमित रह जाता है। धारणी-चिखलदरा के आदिवासी किसान आज भी कर्ज के लिए बैंकों के चक्कर काट रहे हैं। सोसायटी को बैंक से मिलने वाली सुविधाएं कागज पर ही रह जाती हैं।
सभासदों के मन का सवाल?:
“4 साल तक हमारा प्रतिनिधि सोया रहा, और चुनाव के समय रसूखदार आ गया। क्या हमारा वोट और हमारी सोसायटी, संस्था सिर्फ चुनाव जीतने का जरिया है?”
सभासदों की जरूरी मांग:
- पारदर्शी चयन: प्रतिनिधि का चयन आम सभा में खुली चर्चा कर किया जाए, न कि 4 लोगों की बंद कमरे की बैठक में।
- हिसाब जरूरी: हर 3 महीने में प्रतिनिधि को सोसायटी में आकर बताना चाहिए कि बैंक में आदिवासी सभासदों के लिए क्या काम किया।
- योग्यता तय हो: केवल राजनीतिक या आर्थिक रसूख नहीं, बल्कि सहकारिता की समझ और ईमानदारी को आधार बनाया जाए। सहकारिता का मतलब है “एक सबके लिए, सब एक के लिए”। लेकिन जब तक “पांचवें साल वाला खेला” बंद नहीं होगा, तब तक मेलघाट की सोसायटियों, संस्थाओं और आदिवासी सभासदों का फायदा जीरो ही रहेगा। क्योंकि सहकारी सोसायटी आदिवासी बहुल क्षेत्र में सभासदों एवं नागरिकों के हितों के लिए बनाई गई है, ना की सिर्फ चुनाव तक सिमीत रहकर अपना स्वार्थ पुरा करनें के लिए। अब समय आ गया है कि धारणी और चिखलदरा की सोसायटियों, संस्थाओं के सभासद जागें और अपने प्रतिनिधि से सवाल पूछें, हमारी संस्था के सभासदों के हितों के लिए आपने अब तक क्या किया?








