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बेगानीं शादी मे अब्दुल्ला दिवाना अपनी ही पार्टी में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करता ईमानदार कार्यकर्ता

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बेगानीं शादी मे अब्दुल्ला दिवाना
अपनी ही पार्टी में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करता ईमानदार कार्यकर्ता : निष्ठावंतो को नजरअदांज कर मोकापरस्तो को तव्वजो देना राजकीय पार्टीयो को पड़ेगा भविष्य मे भारी

युवा मेलघाट न्यूज| दीपक मालवीया ‘दीपश्री’|अग्रलेख
‘ ब्रिटिश काल में देश को आजाद कराने के लिए तत्कालीन नेताओं के नेतृत्व में देशवासियों ने एकता के साथ लड़कर देश को ब्रिटिश राज के गोरे अंग्रेजों से देश को गुलामी की जंजीर से आज़ाद कराया था। स्वतंत्रता के बाद नेताओं ने देश को नयी दिशा देने ओर अपनी सत्ता कायम रखने के लिए अपनी विचारधारा की राजकीय पार्टीयो को जन्म दिया। अपनी विचारधारा से मेलखाती राजकीय पार्टीयो को जनता ने जहां अपना समर्थन दिया, वहीं अपनी विचारधारा की पार्टी में काम करने वाले कार्यकर्ता अपनी-अपनी पार्टी को सत्ता में लाने के लिए दिन-रात कड़ी मेहनत करते रहे। जिसके बदले में राजकीय पार्टी और शिर्ष नेतुत्व अपने कार्यकर्ताओं के सम्मान में उन्हें संगठन में तव्वजों देते। संगठन की जबाबदारी कुशलता से पार लगाने वाले कार्यकर्ता, पदाधिकारीयों को पार्टी चुनाव में उतारती ओर सत्ता प्राप्त होने पर उन्हें सत्ता की कुर्सी पर बैठाती। जहां कार्यकर्ता से नेता बना व्यक्ति अपनी पार्टी के साथ, कार्यकर्ताओं का भी सम्मान करता था। जहां संगठन की सामुहिक शक्ति से गांव, शहर, तालुका, जिल्हे, राज्य से होते हुए देश का विकास होता था। राजकीय पार्टी में शामिल होना पहले देश सेवा का माध्यम माना जाता था।

पर अब वो दिन लद गए जब अपनी विचारधारा और जमिन से जुड़े पार्टी कार्यकर्ताओं का सम्मान किया जाता है। अब राजकीय पार्टियां सत्ता में आने के लिए और नेता अपना एकछत्र राज कायम रखने के लिए कोई भी समझोता करनें के लिए आज के परिवेश में तैयार बैठे है। आज राजनिती केवल छल कपट के साथ अपने स्वार्थ के लिए सह ओर मात का खेल है। जहां संगठन, विचारधारा, कार्यकर्ता का कोई महत्व नहीं है। इन्हें किनारे कर अपना स्वार्थ के लिए किसी भी स्तर पर जानें को नेताओं से लेकर राजनीतिक पार्टीयां भी तैयार हैं। जहां पद, पैसा, पावर मुख्य एजेंडा रह जाता। ऐसे में सत्ता प्राप्त करने के लिए बग़ैर सोचें समझें नये लोगों को पार्टी में प्रवेश दिया जाता है। जिनका विचारधारा, संगठन से कोई लेना-देना नहीं होता है। जहां नई पार्टी में प्रवेश कर उसकी कमान अपने हाथ में रखने की नये नेताओं की पुरी कोशिश होती है। उन्हें यह मालुम होता है कि, उनका प्रवेश सत्ता के जरिए पद, पैसा, पावर प्राप्त करने के लिए है। आज वे यहां है, तो कल कहीं और रहेंगे। ऐसे में राजकीय पार्टी का नया दामन थामने वाला व्यक्ति पार्टी के ईमानदार, निष्ठावान कार्यकर्ताओं को बाजु कर, केवल मतलब के लिए अपनी जी हुजूरी करने वाले और पुराने कार्यकर्ताओं के साथ पार्टी के अंदर ही अपनी B टिम बनाता है। ऐसे में अपनी विचारधारा वाली पार्टी से जुड़े निष्ठावान, ईमानदार कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर दिया जाता है। ऐसी परिस्थिति में नये नेताओं द्वारा खुद को हाशिए पर धकेले जाने पर जमिनी कार्यकर्ता पदाधिकारीयों में संगठन के प्रति नाराजगी बढ रही है। जहां राजनितिक पार्टीयो मे अंतरकलह चरम पर है। निष्ठावंतो को नजरअदांज कर मोकापरस्तो को तव्वजो देना पार्टीयो को भविष्य में भारी पड़ेगा यह परम सत्य है। ना विचार… ना धारा… बस मोका परिस्ती से उद्धार हमारा…. यहीं ध्येय रह जाता है। ऐसे में जहां कार्यकर्ता, पदाधिकारी भी इस नये ट्रेंड को चुनेगां। ऐसे में पार्टी अपनी विचारधारा से जुड़े निष्ठावान ईमानदार कार्यकर्ताओं को खो देंगी। आज सभी पार्टियां इस महारोग से अछूती नहीं है। सभी अंतर्कलह से ग्रस्त हैं।

राजनितिक पार्टीयों को अपने संगठनों को दिर्घकाल के लिए मजबूत बनाना है तो, निष्ठावान ओर अपनी विचारधारा से जुड़े कार्यकर्ता, पदाधिकारीयों को संगठन में तव्वजों देना जरूरी है। सत्ता का केंद्र संगठन, पदाधिकारी होना चाहिए, ना की सत्ता में बैठा कोई व्यक्ति। अपने तात्पुरता चुनावी फ़ायदे के लिए पार्टीया अपने ईमानदार कार्यकर्ता पदाधिकारीयों को नजरअदांज करना, यह राजकिय संगठनों के लिए आत्मघाती क़दम है। पार्टी अपने चुनावी हार से उभर सकती है, पर अविश्वसनीय व्यक्तियो के हाथों में संघटन की बागडोर यह राजकीय पार्टीयों के लिए आत्महत्या से कम नहीं है। समय पर प्रवेश करके अपनी B टिम बनाकर ख़ुद को मजबूत करना बाहरी नेताओं का मुख्य काम रहता है। भविष्य में राष्ट्रीय पार्टी को कमजोर करके अपनी खुद की लोकल पार्टी खड़ी करना इनका मक़सद बन जाता है। ऐसे में जिस पेड़ ने सहारा दिया, उसी पेड़ की डालीयों को छाटनें का यह काम करते रहते हैं। इतिहास गवाह है, भुतकाल से सबक लेना जरूरी है… नहीं तो, राजकीय पार्टीयों को अपने निष्ठावान कार्यकर्ता पदाधिकारीयों से हाथ धोना पड़ सकता है। कार्यकर्ताओं, पदाधिकारीयों, जन-मन का जुड़ाव पार्टी के विचारधारा के साथ, उसकी विश्वसनीयता के साथ होता है। ऐसे मे… बिना निती..नियत.. नियम..विचारधारा.. विश्वास के राजकीय पार्टी का डुबना निश्चित है। इस रोग, महारोग को समय रहते इलाज और बुस्टर डोज देना आज की ज़रूरत है। आज का तत्काल फायदा आगामी भविष्य में बड़ा नुक़सान पहुंचायेगां यह निश्चित है। जो संगठन इस रोग का इलाज नहीं करेगा उसका डुबनां तय है। विचारधारा, नेतिकता केवल दिखावा मात्र रह जायेगी ” जे का खायला वोके गुण गायला ” कहावत चरितार्थ होंगी। अब देखना है पार्टीयों में बेठा शिर्ष नेतृत्व इस ओर ध्यान देता है या नहीं…. या फिर राजकिय संगठनों में ईमानदार कार्यकर्ताओं का यही हश्र होता रहेगा। मोका परिस्ती की इस नई परंपरा को संगठन के साथ, निष्ठावंत कार्यकर्ता ओर जन-सामान्य भी अपनी मोहर लगाकर मान्यता देंगा या समय रहते अपनी भुल को सुधारेंगे। यह समय का चक्र तय करेंगा। हमें तो सिर्फ परिस्थिति पर नज़र रखना है, और इंतजार करना होगा।

हर राजकीय पार्टी का अपनी पार्टी का विस्तार करना ओर संघटन को मजबुत बनाना उद्देश रहता है। इसके लिए वो नये लोगों को चुनाव के समय पार्टी में शामिल करती है। यह निती चुनाव के परिणाम तो बदल कर अपने पक्ष में कर सकतीं हैं। पर यह तात्पुरता फायदा है। क्योंकि जो अपने स्वार्थ के लिए आया है, वो अपना स्वार्थ के लिए वापस कहीं भी जा सकता है। इसके लिए दिर्घकाल परिणाम चाहिए तो, विचारधारा और संगठन के प्रति निष्ठावंतो की जरूरत है।
पार्टीया अपने विस्तार के लिए अपने पुराने व निष्ठावान कार्यकर्ताओं को नजरंदाज व दरकिनार करके नये लोगो को तवोज्जो देती है, वही कार्यकर्ता भी अपने पर हो रहे अन्याय को देखते हूये पाला बदलता है। वहीं आम जनता भी बिना सोचे समझे ऐसे कृत्यों पर अपनी मोहर लगाती है। ऐसे में विचारधारा, नैतिकता, का कोई मुल्य नही रह जाता।
_______ Disclaimer: यह लेखक के व्यक्तिगत विचार है . युवा मेलघाट न्यूज़ इनसे सहमत होना जरूरी नहीं है ._

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दीपक मालवीया ‘दीपश्री’

शब्दों को हथियार नहीं, पुल बनाता हूं - जो जीवन, समाज और मेलघाट जैसी धरती की मानवीय संवेदनाओं को आपस में जोड़ें। मेरी कोशिश है कि हर रचना तथ्य की जमीन पर खड़ी हो और भावना की हवा से छुए। सरल भाषा में लिखता हूं, ताकि बात सीधे दिल तक जाए। Mobile No. +91 7875842661

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