कॉलम हटाओ,देश जोड़ो: अब आरक्षण का आधार जाति नहीं, जरूरत हो
75 साल बाद बैसाखी की नहीं, बराबर मैदान की जरूरत
युवा मेलघाट न्यूज़ | ब्यूरो टिम
दि.7 जुलाई 2026 | देश आजाद हुए 78 साल हो गए। संविधान को लागू हुए 75 साल। इन 75 सालों में आरक्षण की बैसाखी ने लाखों परिवारों को चलना सिखाया। SC, ST, OBC के बेटे-बेटियां IAS, डॉक्टर, इंजीनियर बने। महामानव बाबासाहेब अंबेडकर का सपना था – “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो”। वो सपना एक हद तक पूरा हुआ।
लेकिन आज 2026 में खड़े होकर हमें खुद से एक सवाल पूछना होगा। जिस बैसाखी के सहारे हम चले थे, क्या अब वो बैसाखी ही हमारी लाठी बन गई है? जिस जाति को मिटाना था, क्या हम उसी जाति को हर सरकारी फॉर्म में बार-बार लिखकर जिंदा नहीं रख रहे? गौतम बुद्ध ने 2500 साल पहले ही इस दीवार को गिरा दिया था। उन्होंने कहा था जन्म से कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। कर्म से होता है। डॉ. अंबेडकर ने भी इसी सोच के साथ कहा था कि “मैं हिंदू पैदा हुआ ये मेरे बस में नहीं, लेकिन हिंदू मरूंगा नहीं ये मेरे बस में है”। उन्होंने जाति तोड़ने के लिए बौद्ध धर्म अपनाया। उनका मकसद साफ था – भेदभाव मिटाना।
1947 में जब संविधान बना तो हालात अलग थे। तब दलितों को स्कूल में नहीं बैठने दिया जाता था। कुएं से पानी नहीं भरने दिया जाता था। इसलिए आरक्षण और बाद में एट्रोसिटी कानून लाना जरूरी था। वो पट्टी थी उस जख्म पर जो सदियों से रिस रहा था। और सच ये भी है कि उस पट्टी ने काम किया। पर आज तस्वीर बदल गई है। आज SC कैटेगरी में भी ऐसे परिवार हैं जिनके पास 3-3 मकान, गाड़ी और सरकारी नौकरी है। उनकी तीसरी पीढ़ी 50 हजार फीस वाले स्कूल में पढ़ रही है। वहीं दूसरी तरफ जनरल कैटेगरी का किसान है जिसके पास 2 एकड़ जमीन है और 3 लाख का कर्ज। उसका बेटा 90% नंबर लाने के बाद भी फीस के कारण इंजीनियरिंग नहीं कर पा रहा। क्या ये सामाजिक न्याय है? दूसरी सबसे बड़ी चोट “कॉलम” ने की है। एडमिशन फॉर्म से लेकर नौकरी के फॉर्म तक, हर जगह पहले जाति पूछी जाती है, इंसान बाद में। जब तक कागज पर SC, ST, OBC, GEN लिखा जाता रहेगा, तब तक दिमाग में “मैं तुमसे अलग हूं” ये लकीर नहीं मिटेगी। हम अनजाने में उसी दीवार को सीमेंट से मजबूत कर रहे हैं जिसे महामानव डाॅ.बाबासाहेब आंबेडकर ने तोड़ना चाहा था। एट्रोसिटी कानून का हाल भी ऐसा ही है। कानून जरूरी था ताकि कमजोर पर अत्याचार रुके। लेकिन आज कई जगह इसका इस्तेमाल रंजिश निकालने, जमीन हड़पने और राजनीति के दबाव के लिए हो रहा है। नतीजा क्या निकला? डर बढ़ गया, नफरत बढ़ गई। पर दिल नहीं जुड़े। बुद्ध कहते थे घृणा से घृणा खत्म नहीं होती।
तो क्या समाज नहीं बदल रहा? बदल रहा है। और बहुत तेजी से बदल रहा है। आज गांव का लड़का शहर की लड़की से बिना जाति पूछे शादी कर रहा है। फैक्ट्री में, सेना में, क्लासरूम में सब साथ बैठकर खाना खा रहे हैं। असली क्रांति वहीं हो रही है। कानून डर दे सकता है, पर बराबरी का भाव नहीं दे सकता।अब वक्त आ गया है कि हम सिस्टम को भी समाज के साथ बदलें। इसके लिए 3 कदम उठाने होंगे।
पहला कदम है कागज से जाति मिटाना। सरकारी स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, नौकरी – हर फॉर्म से “जाति और धर्म” का कॉलम हमेशा के लिए हटना चाहिए। टीचर रोलकॉल में सिर्फ नाम ले। डॉक्टर पर्चे पर सिर्फ मरीज लिखे। जब कागज पर बंटना बंद होगा, तभी हम दिल से एक होंगे। हमारी एक ही जाति हो – मानवता। हमारा एक ही धर्म हो – भारतीय।
दूसरा कदम है मदद का आधार बदलना। अब मदद “जाति देखकर” नहीं “जरूरत और योग्यता देखकर” मिलनी चाहिए। सरकार पहले देश के सबसे गरीब 20% परिवारों की लिस्ट बनाए। फिर उसमें से टैलेंट के आधार पर स्कॉलरशिप, फ्री कोचिंग, हॉस्टल दे। जो परिवार 2 पीढ़ी से आगे निकल गए हैं, जिनकी सालाना आय 15 लाख से ऊपर है, उन्हें स्वेच्छा से पीछे हटना चाहिए। ताकि सबसे पीछे वाला उठ सके। यही संविधान की आत्मा है और यही बाबासाहेब का असली सपना।
तीसरा और सबसे जरूरी कदम है जड़ पर वार करना। आज हम आरक्षण के लिए लड़ते हैं क्योंकि सरकारी स्कूल लाचार हैं और प्राइवेट की फीस लाखों में है। सरकारी अस्पताल में बेड नहीं और प्राइवेट में इलाज कराने के लिए जमीन बेचनी पड़ती है। अगर सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य को 100% फ्री और वर्ल्ड क्लास बना दे, तो 80% समस्या वहीं खत्म। जब हर सरकारी स्कूल IIT जैसा और हर PHC AIIMS जैसा होगा, तो किसी मां को गहने बेचकर बेटी को पढ़ाना नहीं पड़ेगा। किसी बाप को कर्ज लेकर बेटे का इलाज नहीं कराना पड़ेगा। तब हर परिवार 10 साल में आत्मनिर्भर हो जाएगा।
नेता ये बदलाव नहीं करेंगे। क्योंकि “जाति का कॉलम” ही उनका वोट बैंक है। ये बदलाव हमें और आपको करना होगा। पंचायत से, स्कूल से, सोशल मीडिया से। आइए आज शपथ लें। न कोई आगे, न कोई पीछे। न कोई SC, न कोई जनरल। सिर्फ इंडियन। सिर्फ इंसान क्योंकि जिस दिन आखिरी पंक्ति में खड़ा व्यक्ति भी बिना बैसाखी के दौड़ने लगेगा, उसी दिन भारत सच में विश्वगुरु बनेगा।
#कॉलम हटाओ देश_जोड़ो
लेखक: एक आम भारतीय नागरिक
दीपक मालवीया ‘दीपश्री’
पत्रकार व सामाजिक नेता
धारणी मो.7875842661








